MAHAAVTARAN








 



   







Shri Aadishakti Maa Nirmala Devi J
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Born:       March 21, 1970, Chhindwara

Died:        February 23, 2011, Genoa

Spouse:    Chandrika Prasad Srivastava   
                  (m. 1947-2011)

Parents:   Cornelia Salve, Prasad

Children:  SadhanaVarma,   

                 Kalpana Srivastava









 

श्री निर्मला श्रीवास्तव ( विवाह पूर्व)  निर्मला साल्वे  जिन्हें श्री माताजी निर्मला देवी के नाम से जानते हैं, सहजयोग, नामक एक नये धार्मिक आंदोलन, की संस्थापना की।  वह आदि शक्ति का पूर्ण अवतार हैं,

 
प्रारंभिक जीवन

 श्री निर्मला देवी का जन्म 21 मार्च 1923 को पृथ्वी पर ठीक बीचो- बीच  कर्क  के तथा समय ठीक दोपहर 12:00 बजे भारतीय राज्य मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा जिले के , एक ईसाई परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम प्रसादराव साल्वे तथा माता का नाम कोर्नेलिया साल्वे था। निर्मला देवी के अनुसार उनका परिवार शालिवाहन राजवंश से प्रत्यक्ष रूप से संबंधित था। जन्म के समय उनके निष्कलंक रूप को देखकर उन्हें ‘निर्मला‘नाम दिया था तथा बाद के वर्षों में वे  श्री माताजी निर्मला देवी के नाम से प्रसिद्ध हुईं। उनके मातापिता ने भारत के स्वतंत्रता संग्राम में अग्रणी भूमिका निभाई थी। उनके पिता के महात्मा गाँधी के साथ नजदीकी संबंध थे। वे स्वयं भी भारत की संविधान सभा के सदस्य थे तथा उन्होंने स्वतंत्र भारत के संविधान को लिखने में मदद की थी। उन्हें 14 भाषाओं का ज्ञान था। उन्होंने कुरान का मराठी भाषा में अनुवाद किया था। निर्मला देवी की माता वो प्रथम भारतीय महिला थीं जिन्हें गणित में स्नातक की ऑनर्स उपाधि प्राप्त हुई थी।
निर्मला जी का बचपन उनके नागपुर के पैतृक निवास में बीता था।युवा होने पर निर्मला देवी अपने माता पिता के साथ गाँधीजी के आश्रम में रहने लगीं। गांधीजी ने निर्मला देवी के विवेक और पांडित्य को देखकर उन्हें निरंतर प्रोत्साहन दिया। अपने माता पिता के समान निर्मला देवी ने भी स्वतंत्रता संग्राम में हिस्सा लिया और,
1942 में गांधीजी के असहयोग आन्दोलन में सक्रिय भागीदारी के कारण निर्मला देवी को भी अन्य स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के साथ जेल जाना पड़ा।
निर्मला देवी के अनुसार उन्हें जन्म से ही मनुष्य के सम्पूर्ण नाड़ी तंत्र का ज्ञान था, साथ ही वो इसके उर्जा केन्द्रों से भी परिचित थीं। परन्तु इस सम्पूर्ण ज्ञान को वैज्ञानिक आधार देने तथा वैज्ञानिक शब्दावली के अध्ययन हेतु उन्होंने क्रिश्चियन मेडिकल कॉलेज, लुधियाना और बालकराम मेडिकल कॉलेज, लाहौर से आयुर्विज्ञान एवं मनोविज्ञान का अध्ययन किया था।
भारत की स्वतंत्रता प्राप्ति से कुछ समय पहले
1947 में, निर्मला जी ने चंद्रिका प्रसाद श्रीवास्तव नामक एक उच्चपदासीन भारतीय प्रशासनिक अधिकारी से शादी कर ली।, चंद्रिका प्रसाद श्रीवास्तव, ने बाद में लाल बहादुर शास्त्री के प्रधानमंत्री कार्यकाल के दौरान संयुक्त सचिव के रूप में कार्य किया, उन्हें इंग्लैंड की महारानी द्वारा मानद नाइटहुड भी प्रदान किया गया। निर्मला देवी की दो बेटियां, कल्पना श्रीवास्तव, और साधना वर्मा,हैं। 1961 में, निर्मला जी ने ‘‘यूथ सोसायटी फॉर फिल्म्स " की शुरुआत युवाओं में राष्ट्रीय, सामाजिक और नैतिक मूल्यों को बढ़ावा देने के लिए की थी। वह केन्द्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड की सदस्य भी रहीं

मैं आज घोषणा करती हूं कि मैं ही आदिशक्ति हूं.....

श्रीमाताजी की उद्घोषणा,
डॉलिस हिल आश्रम लंदन,
इंग्लैंड, 2 दिसम्बर 1979।)

सहज योग की खोज -  महाअवतरण आदिशक्ति माताजी श्री निर्मला देवी जी नेमई 1970 को कुंडलिनी जागरण की इस प्रक्रिया की खोज की जिसे आत्म-साक्षात्कार कहा जाता है और तब से दुनिया भर के साधकों को आत्म-साक्षात्कार दिया है। सहज योग ध्यान के माध्यम से कुंडलिनी जागरण ने दुनिया भर में लाखों लोगों के जीवन को बदल दिया क्योंकि उन्होंने दुनिया भर के साधकों को आत्म-साक्षात्कार सुनिश्चित करने के लिए महाद्वीपों की यात्रा की। 

सहज योग की शुरुआत परम पूज्य श्री माताजी निर्मला देवी ने अपना पैसा खर्च करके और अपने कीमती आभूषण बेचकर मानव जाति के विकास के लिए खुद को समर्पित कर दिया। मानव जाति के विकास के लिए उनकी दृढ़ता और समर्पण ही था कि आज उनके शिष्य सभी प्रमुख देशों के लगभग हर बड़े शहर में हैं। उनका मानना ​​था कि एक बार साधक के भीतर जागृत कुंडलिनी शक्ति में सभी शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक और आध्यात्मिक मुद्दों को हल करने की क्षमता होती है।

आत्म-साक्षात्कार प्राप्त करने वाले साधकों ने अपनी हथेली और सिर के ऊपर ठंडी हवा (कंपन) को महसूस किया और इस प्रकार वैज्ञानिक रूप से साधक के भीतर कुंडलिनी आंदोलन को महसूस किया। आत्म-साक्षात्कार हमेशा सभी धर्मों और आध्यात्मिक परंपराओं का अंतिम लक्ष्य रहा है और विभिन्न धर्मों में इसका अलग-अलग वर्णन किया गया है।

आदिशक्ति श्री माताजी निर्मला देवी ने कहा कि मई 1970 को नरगोल में रहते हुए, उन्होंने अपने भीतर मूल कुंडलिनी के उदय को देखा। बाद में उसने अनुभव का वर्णन इस प्रकार किया: "मैंने देखा कि मेरी कुंडलिनी बहुत तेजी से उठ रही है जैसे कि एक दूरबीन खुल रही है और यह एक सुंदर रंग था जिसे आप देखते हैं जब लोहे को गर्म किया जाता है, एक लाल गुलाब रंग, लेकिन बेहद ठंडा और सुखदायक" उन्होंने कहा कि इस समय पूरी मानवता के लिए आध्यात्मिक आत्म-जागरूकता हासिल करने की क्षमता का एहसास हुआ,महाअवतरण आदिशक्ति माताजी श्री निर्मला देवी जी ने "सामूहिक आत्म-साक्षात्कार और आंतरिक परिवर्तन की ऐतिहासिक प्रक्रिया" के रूप में वर्णित किया।

इसके तुरंत बाद उन्होंने साधकों को आत्म-साक्षात्कार प्रदान करने के लिए सहज योग की स्थापना की।

आज का दिन अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि बहुत समय पहले ... जब ईसा नन्हे बालक थे तो उन्होंने उस समय के अनेकों लोगों को बताया कि वह एक अवतरण हैं ... जो मानवता की रक्षा हेतु आये हैं। उस समय के लोगों का विश्वास था कि उनकी रक्षा हेतु कोई आने वाला है। बहुत समय पहले एक रविवार को उन्होंने उद्घोषणा की कि वही मानव मात्र की रक्षा के लिये आये हैं। इसी कारण आज अवतरण रविवार (Advent Sunday) है। उनको बहुत कम समय तक जीवित रहना था। अतः बहुत ही कम उम्र में उन्हें उद्घोषणा करनी पड़ी कि वह एक अवतरण थे। यह देखना अत्यंत महत्वपूर्ण है कि किसी भी अन्य अवतरण ने सार्वजनिक रूप से ये बात कभी नहीं कही कि वे अवतरण हैं। श्रीराम तो भूल ही गये थे कि वह एक अवतरण थे। एक तरह से उन्होंने स्वयं को ही भुला दिया था ....  उन्होंने अपनी माया से स्वयं को पूर्णतया एक साधारण मानव बना लिया था --- मर्यादापुरूषोत्तमश्री कृष्ण ने भी केवल एक ही व्यक्ति ... अर्जुन को युद्ध प्रारंभ होने से पहले यह बात बताईअब्राहम ने भी कभी नहीं कहा कि वह एक अवतरण हैं जबकि वह आदि गुरू दत्तात्रेय के साक्षात् अवतरण थे। दत्तात्रेयजी ने भी स्वयं कभी नहीं बताया कि वह आदि गुरू के अवतरण हैंये तीनों धरती पर आकर लोगों का मार्ग दर्शन करने के लिये आये। मोजेज या मूसा ने भी कभी नहीं कहा ... यद्यपि वह जानते थे कि वह महान थे। उन्होंने प्रकृति पर अधिकार प्राप्त कर लिया था फिर भी उन्होंने कभी नहीं कहा कि वह एक अवतरण थे।
 
मैंने भी अपने बारे में कभी कुछ नहीं कहा क्योंकि ऐसा लगा कि मानव ने अहं का एक दूसरा ही आयाम प्राप्त कर लिया था ईसा के समय से भी भयानक। आप इसको चाहे कुछ भी नाम दे दें, आप इसको औद्यौगिक क्रांति कह सकते हैं क्योंकि आप प्रकृति से दूर हैं ... आप इसे कुछ भी नाम दे सकते हैं। लेकिन मनुष्य वास्तविकता से बहुत दूर चला गया है। उनकी पहचान बनावटीपन से है और इस प्रकार की वास्तविकता को स्वीकार करना उनके लिये  एकदम असंभव होगा। इसीलिये मैंने अपने बारे में तब तक एक भी शब्द नहीं कहा जब तक कि कुछ संतों ने मेरे विषय में लोगों को नहीं बताया। कुछ बाधाग्रस्त लोगों ने भी मेरे विषय में बताया और लोग आश्चर्यचकित हो गये कि किस प्रकार से कुंडलिनी जागरण जैसा कठिन कार्य श्रीमाताजी की उपस्थिति में इतनी तेजी से संभव हो सकता है

भारत में एक मंदिर था और लोग इसके विषय में बिल्कुल नहीं जानते थे। लेकिन उनको धीरे धीरे पता चला कि पानी के जहाज एक विशेष बिंदु पर जाकर किनारे की ओर खींच लिये जाते थे और उन्हें वापस लाना काफी कठिन कार्य था। उस बल से जहाजों को दूर ले जाने के लिये उन्हें दोगुना बल प्रयोग करना पड़ता था। उन्हें यह मालूम नहीं था कि वहां पर कोई अन्य चीज कार्य कर रही थी। उन्होंने सोचा कि समुद्र की गहराई में कुछ गड़बड़ है। लेकिन यह लगातार कई जहाजों के साथ हो रहा था। उन्होंने इसका पता लगाने की सोची कि आखिर क्यों कई जहाजों के साथ ऐसा हो रहा था। क्यों सभी जहाज अचानक से किनारे की ओर खींच लिये जाते थे। उन्होंने पता लगाने की सोची और वे जंगल में गये तो उन्हें वहां एक बड़ा मंदिर मिला और उस मंदिर के ऊपर एक बड़ा चुंबक लगा हुआ था।

अतः अपनी तार्किक सोच से लोग इस बिंदु पर पंहुचते हैं कि माताजी को कुछ विशेष ही होना चाहिये क्योंकि हमारे ग्रंथों में कहीं भी यह नहीं लिखा है कि कोई ऐसा अवतरण इस पृथ्वी पर आया है जो अपनी दृष्टि के कटाक्ष मात्र से .... यहां तक सोचने मात्र से ही कुंडलिनी को उठा सकता है। कई संत जो इस भीड भाड़ भरे संसार से दूर रहकर हिमालय के जंगलों में तपस्या कर रहे हैं .... वे सब इसके विषय में जानते हैं ... क्योंकि उनकी चेतना इस (उच्च) स्तर की है। वे आप लोगों से कहीं अधिक इस बात को समझते हैं क्योंकि आप सभी अभी शिशु हैं.... नवजात शिशुसम। लेकिन वे (संत) परिपक्व हो चुके हैं।

लेकिन आज ही वह दिन है जब मैं घोषणा करती हूं कि मैं ही वह हूं जो मानवता को बचाने के लिये आई हूं। मैं घोषणा करती हूं कि मैं ही वह हूं जो आदिशक्ति हैं .... जो सब माताओं की माता हैं ... जो आदिमाता हैं.. आदिशक्ति हैं ...परमेश्वर की इच्छा ... जिसने धरती पर स्वयं को, इस सृजन को और मानव मात्र को अर्थ देने के लिये अवतरण लिया है ... और मुझे विश्वास है कि अपने प्रेम एवं धैर्य के माध्यम से मैं वह सब प्राप्त कर लूंगी। मैं ही वह हूं जिसने इस धरती पर बारंबार जन्म लिया लेकिन आज मैं अपने पूर्णावतार और अपनी संपूर्ण शक्तियां लेकर मैं इस धरती पर आई हूं ... न केवल मानव को मोक्ष दिलाने के लिये बल्कि उनको स्वर्ग का साम्राज्य दिलाने के लिये एवं वह असीम आनंद व प्रसनन्ता प्रदान करने के लिये जो उनके पिता परमेश्वर उनके ऊपर बरसाना चाहते हैं।


इन शब्दों को कुछ समय के लिये सहजयोगियों तक ही सीमित रखा जाय। 
आज का दिन गुरूपूजा का दिन है..... मेरी पूजा का नहीं ... बल्कि गुरू रूप में आपकी पूजा का । मैं आप सबको गुरूपद का आशीर्वाद देती हूं और आज ही मैं आप सबको बताऊंगी कि मैंने आपको क्या दिया है और कौन सी महान शक्तियां आपके अंदर पहले ही हैं।   

आपमें से कई लोग ऐसे हैं जो अभी भी .... मुझे पहचान नहीं सके हैं। मेरी इस उद्घोषणा से वे भी स्वयं इसे जान जायेंगे..... पहचान जायेंगे। बिना पहचान के आप इस खेल को .... लीला को नहीं देख सकते हैं ... बिना इस लीला के आपके अंदर आत्मविश्वास नहीं आ सकता .... और बिना विश्वास के आप स्वयं के गुरू या गुरू नहीं बन सकते हैं ... और बिना गुरू बने आप किसी की भी सहायता नहीं कर सकते हैं ... और बिना लोगों की सहायता किये आप प्रसन्न नहीं रह सकते हैं। अतः श्रृंखला को तोड़ना तो अत्यंत आसान है पर आपको एक के बाद दूसरा और दूसरे के बाद तीसरे को इसमें जोड़ना है ... और आपको यही कार्य करना है। यही आप सब बनना भी चाह रहे थे। अतः स्वयं पर विश्वास रखें ... प्रसन्न रहें कि मेरी शक्तियां सदैव आपकी रक्षा करेंगी। मेरा प्रेम आपको पोषित करेगा और मेरे स्वभाव से आपके अंदर प्रेम व शांति के भाव भर जायेंगे। 


परमात्मा आपको आशीर्वादित करें।